दुनिया का खेला: अनुपम मिश्र की ज़ुबानी

Thursday, July 11, 2019
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नाट्य शास्त्र हमारे हाथ आया कोई 17 सौ बरस पहले

नाटक में नौ रस हैं, दुनिया के खेला में भी नौ रस तो हैं ही भाई पर इनमें नाटकों के अतिरक्ति एक रस और जुड़ गया है। आप सब भी हैरान होंगे कि नौ के दस कैसे हो गए। इस रस का नाम है - गन्ना रस! गन्ने का रस भी मिल जाता है। कैसे? आपने गन्ने का रस ठेले पर सामने खड़े होकर पिया ही होगा। पहले साबुत गन्ना डालते हैं। फिर एक बार रस निकल आया तो उसी गन्ने को दो बार मोड़ कर फिर रस निकाला जाता है। फिर तीसरी बार दो के बदले तीन-चार बार मोड़ कर अदरक, नींबू लगा कर फिर...

भूमि सुधार बस एक सपना ही रह गया

Saturday, May 30, 2020
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ग्रामीण भारत के 56 प्रतिशत परिवारों के पास कोई खेती की ज़मीन नहीं है। चित्र: मनु मुदगिल

आज़ादी के समय भारत के कृषि ढांचे की विशेषता भूमि के असमान वितरण और किसानों के शोषण से थी। ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त जागीरदारों और जमींदारों जैसे बिचौलिये किसानों से उच्च किराया इकट्ठा करते थे। इन बिचौलियों को खेती और कृषि भूमि के सुधार में कोई दिलचस्पी नहीं थी। किसानों के नाम ज़मीन नहीं थी, उनके कार्यकाल की कोई सुरक्षा नहीं थी और देश के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भू-राजस्व और स्वामित्व...

किसानों और जंगली जानवरों का लफड़ा क्या है

Wednesday, September 25, 2019
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क्या सच में किसानों का लालच हाथियों के घटते रहवास के लिए जिम्मेदार है? Source: Need Pix.com

ये सच है कि जंगल साफ़ करके खेत बनाने की प्रवत्ति किसानों में बहुत पुरानी है। आदमी और जानवरों की लड़ाई भी बहुत पुरानी है। लेकिन इस सब में हम ये भूल जाते हैं कि बहुतायत भारतीय किसान अपने उत्पादन का अधिकतर हिस्सा घरेलू जरूरतों के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन औपनिवेशिक काल के ये उद्योग किसकी भूख को ध्यान में रख कर बनाये गए थे, क्या इसमें हमें कोई हिस्ट्री क्लास चाहिए? जिस औद्योगिक नीति से...

'जी.एम. सरसों से छिन जाएगी हमारी आजादी'

Thursday, June 8, 2017
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भारत में 65 से अधिक विभिन्न प्रकार के सरसों हैं. चित्र: CCAFS/Flickr.

पर्यावरण मंत्रालय जल्द ही जी. एम. सरसों को मंज़ूरी दे सकता है। मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग स्वीकृति समिति ने 11 मई 2017 को दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा विकसित जी. एम. सरसों के बीज, डी. एम. एच. 11, के व्यावसायिक उपयोग की सिफारिश की थी। यदि पर्यावरण मंत्रालय इसे स्वकृति देता है तो डी. एम. एच. 11 भारत की पहली जेनेटिकली मॉडिफाइड (जी. एम) खाद्य फसल बन जाएगी। आलोचकों  का सबसे बड़ा आरोप है कि परीक्षणों से संबंधित वैज्ञानिक डेटा को अभी तक गुप्त...

नदी की धारा सा अविरल समाज

Thursday, June 30, 2016
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एक मन्दिर और छोटा सा सरोवर नांडूवाली नदी के उद्गम स्थल को चिन्हित करते हैं.

यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक समय था जब यह नदी और जंगल सूख चुके थे। कुओं में कटीली झाड़ियां उग आई थी। बरसात के पानी से जो थोड़ी बहुत फसल होती थी, उसमें लोगों को गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा था।  पैसों की कमी के चलते लोगों को गाय भैंस का चारा खरीदना भारी पड़ रहा था, इसीलिए वे उन्हें बेच कर बकरियां रखने लगे। वहीं रोज़ी रोटी के लिए लोगों को मजबूरन यहां से पलायन करना पड़ रहा था। लेकिन आज यह इलाका न केवल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है बल्कि आर्थिक रूप से...

‘हर बीज एक राजनीतिक बयान देता है’

Tuesday, March 10, 2015
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 बहुत सी परंपरागत फसलें बीमारी से निजात पाने में मददगार होती हैं, जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है।

आलू जो कि बेल पर उगता है,  चावल को पानी में भिगोने के बाद कच्चा खाया जा सकता है, दलिया (फटा गेंहू) प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। यह सब सुनने में भले ही अटपटा लगे। लेकिन हमारे किसान सदियों से यह सब उगाते आ रहे हैं। इनके अलावा, ऐसी बहुत सी फसलें हैं जो कि खासतौर पर बीमारी से निजात पाने में मदद करती हैं और जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। लाल चावल के बारे में आप क्या कहेंगे जिसे इसकी पौष्टिकता के चलते खासतौर पर गर्भवती...

‘तवायफें उच्च शिक्षित महिलाएं थीं जिन्हें नई नैतिकता ने सामाजिक परिदृश्य से हटा दिया’ 

Friday, October 30, 2015
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 रसूलन बाई अपनी ठुमरी के लिए प्रसिद्ध थी 

तवायफों ने उस युग में संगीत और साहित्यिक परिदृश्य में अपना योगदान दिया जब ज्यादातर महिलाएं पर्दे में रहती थीं। ‘द अदर सॉन्ग’ ऐसी फिल्म है जो कि इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे इन कलाकारों का दमन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उनका पेशा विलुप्त होता चला गया। हमने बात की फ़िल्मकार सबा दीवान से इस कठिन विषय को पर्दे पर उतारने के अनुभव के बारे में

नर्मदा बचाओ आंदोलनः सच्चाई से साक्षात्कार

Tuesday, December 3, 2013
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नाविक और मछुआरे सरदार सरोवर में अपने पानी और मछली पर हक के लिए प्रदर्शन करते हुए। सौजन्य: नर्मदा बचाओ आन्दोलन

नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ काम करने के मेरे निर्णय से बहुत से लोग आश्चर्यचकित थे। मध्य भारत के ग्रामीण इलाके में काम करके गर्मियों की छुट्टियां बिताने के मेरे फैसले पर  दोस्तों और परिजनों ने सवाल उठाए। लेकिन आंदोलन को लेकर मेरे मन में जो जिज्ञासा थी, मैं उसे शांत करना चाहती थी। 90 के दशक में पैदा होने के चलते मैं और मेरे जैसे बहुत से लोग देश के उन पलों के साक्षी नहीं बन सके जब कार्यकर्ता पूरे साहस के साथ आंदोलन के साथ खड़े थे। हम जब पैदा हुए...

प्रकृति मेरे द्वार   

Sunday, November 9, 2014
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गांवों में लोगों ने स्थानीय सामग्री का प्रयोग करके, वहां की जलवायु को समझते हुए आवासों का निर्माण किया है

विश्वव्यापीकरण के नक्शेकदम पर चलते हुए हम अपने शहरों को अगला शिंघाई और दुबई बनाने में जुटे हैं और इसके चलते हम अपनी मजबूत सांस्कृतिक पहचान पीछे छोड़ते जा रहे हैं। वास्तुकला में यह बदलाव परंपरागत, अनूठे और उस जगह की जलवायु के हिसाब से बने हुए से लेकर आधुनिक, नीरस और सामान्य घरों के रूप में पहले के मुकाबले अब तेजी से हो रहा है। उदाहरण के लिए अगर हम पहले के समय को देखें, जब आंख बंद करके दूसरों की नकल करने की बजाय हम अपनी खुद की अद्वितीय...

‘सिर्फ मंशा से नहीं बदलेगी यमुना की काया’

Saturday, June 18, 2016
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एक अस्थायी बेड़े पर यमुना से प्लास्टिक के थैले इकठे करता यह आदमी एक महत्वपूर्ण काम कर रहा है । Source: Koshy Koshy/Flickr

यमुना एक्शन प्लान गंगा एक्शन प्लान पर आधारित है। और समस्या दोनों प्लान में एक ही रही है, कि उनकी स्थिति को समझे बिना उनका हल ढ़ूंढ़ने का प्रयास किया गया है। आपने नदियों को समझा नहीं और बिना समझे उनकी सफाई में जुट गए। नदियां कोई नहर नहीं हैं। वे जीवित तंत्र हैं। जब तक आप उसके जीवन को वापस नहीं लाएंगे, नदियां वापस नहीं आ सकतीं। मात्र एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) बना देने से या फिर सीवरेज को नदियों में गिरने से रोक देने से नदियां साफ नहीं हो...