'जी.एम. सरसों से छिन जाएगी हमारी आजादी'

Thursday, June 8, 2017
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भारत में 65 से अधिक विभिन्न प्रकार के सरसों हैं. चित्र: CCAFS/Flickr.

पर्यावरण मंत्रालय जल्द ही जी. एम. सरसों को मंज़ूरी दे सकता है। मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग स्वीकृति समिति ने 11 मई 2017 को दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा विकसित जी. एम. सरसों के बीज, डी. एम. एच. 11, के व्यावसायिक उपयोग की सिफारिश की थी। यदि पर्यावरण मंत्रालय इसे स्वकृति देता है तो डी. एम. एच. 11 भारत की पहली जेनेटिकली मॉडिफाइड (जी. एम) खाद्य फसल बन जाएगी। आलोचकों  का सबसे बड़ा आरोप है कि परीक्षणों से संबंधित वैज्ञानिक डेटा को अभी तक गुप्त...

नदी की धारा सा अविरल समाज

Thursday, June 30, 2016
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एक मन्दिर और छोटा सा सरोवर नांडूवाली नदी के उद्गम स्थल को चिन्हित करते हैं.

यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक समय था जब यह नदी और जंगल सूख चुके थे। कुओं में कटीली झाड़ियां उग आई थी। बरसात के पानी से जो थोड़ी बहुत फसल होती थी, उसमें लोगों को गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा था।  पैसों की कमी के चलते लोगों को गाय भैंस का चारा खरीदना भारी पड़ रहा था, इसीलिए वे उन्हें बेच कर बकरियां रखने लगे। वहीं रोज़ी रोटी के लिए लोगों को मजबूरन यहां से पलायन करना पड़ रहा था। लेकिन आज यह इलाका न केवल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है बल्कि आर्थिक रूप से...

‘हर बीज एक राजनीतिक बयान देता है’

Tuesday, March 10, 2015
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 बहुत सी परंपरागत फसलें बीमारी से निजात पाने में मददगार होती हैं, जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है।

आलू जो कि बेल पर उगता है,  चावल को पानी में भिगोने के बाद कच्चा खाया जा सकता है, दलिया (फटा गेंहू) प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। यह सब सुनने में भले ही अटपटा लगे। लेकिन हमारे किसान सदियों से यह सब उगाते आ रहे हैं। इनके अलावा, ऐसी बहुत सी फसलें हैं जो कि खासतौर पर बीमारी से निजात पाने में मदद करती हैं और जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। लाल चावल के बारे में आप क्या कहेंगे जिसे इसकी पौष्टिकता के चलते खासतौर पर गर्भवती...

‘तवायफें उच्च शिक्षित महिलाएं थीं जिन्हें नई नैतिकता ने सामाजिक परिदृश्य से हटा दिया’ 

Friday, October 30, 2015
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 रसूलन बाई अपनी ठुमरी के लिए प्रसिद्ध थी 

तवायफों ने उस युग में संगीत और साहित्यिक परिदृश्य में अपना योगदान दिया जब ज्यादातर महिलाएं पर्दे में रहती थीं। ‘द अदर सॉन्ग’ ऐसी फिल्म है जो कि इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे इन कलाकारों का दमन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उनका पेशा विलुप्त होता चला गया। हमने बात की फ़िल्मकार सबा दीवान से इस कठिन विषय को पर्दे पर उतारने के अनुभव के बारे में

नर्मदा बचाओ आंदोलनः सच्चाई से साक्षात्कार

Tuesday, December 3, 2013
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नाविक और मछुआरे सरदार सरोवर में अपने पानी और मछली पर हक के लिए प्रदर्शन करते हुए। सौजन्य: नर्मदा बचाओ आन्दोलन

नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ काम करने के मेरे निर्णय से बहुत से लोग आश्चर्यचकित थे। मध्य भारत के ग्रामीण इलाके में काम करके गर्मियों की छुट्टियां बिताने के मेरे फैसले पर  दोस्तों और परिजनों ने सवाल उठाए। लेकिन आंदोलन को लेकर मेरे मन में जो जिज्ञासा थी, मैं उसे शांत करना चाहती थी। 90 के दशक में पैदा होने के चलते मैं और मेरे जैसे बहुत से लोग देश के उन पलों के साक्षी नहीं बन सके जब कार्यकर्ता पूरे साहस के साथ आंदोलन के साथ खड़े थे। हम जब पैदा हुए...

प्रकृति मेरे द्वार   

Sunday, November 9, 2014
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गांवों में लोगों ने स्थानीय सामग्री का प्रयोग करके, वहां की जलवायु को समझते हुए आवासों का निर्माण किया है

विश्वव्यापीकरण के नक्शेकदम पर चलते हुए हम अपने शहरों को अगला शिंघाई और दुबई बनाने में जुटे हैं और इसके चलते हम अपनी मजबूत सांस्कृतिक पहचान पीछे छोड़ते जा रहे हैं। वास्तुकला में यह बदलाव परंपरागत, अनूठे और उस जगह की जलवायु के हिसाब से बने हुए से लेकर आधुनिक, नीरस और सामान्य घरों के रूप में पहले के मुकाबले अब तेजी से हो रहा है। उदाहरण के लिए अगर हम पहले के समय को देखें, जब आंख बंद करके दूसरों की नकल करने की बजाय हम अपनी खुद की अद्वितीय...

‘सिर्फ मंशा से नहीं बदलेगी यमुना की काया’

Saturday, June 18, 2016
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एक अस्थायी बेड़े पर यमुना से प्लास्टिक के थैले इकठे करता यह आदमी एक महत्वपूर्ण काम कर रहा है । Source: Koshy Koshy/Flickr

यमुना एक्शन प्लान गंगा एक्शन प्लान पर आधारित है। और समस्या दोनों प्लान में एक ही रही है, कि उनकी स्थिति को समझे बिना उनका हल ढ़ूंढ़ने का प्रयास किया गया है। आपने नदियों को समझा नहीं और बिना समझे उनकी सफाई में जुट गए। नदियां कोई नहर नहीं हैं। वे जीवित तंत्र हैं। जब तक आप उसके जीवन को वापस नहीं लाएंगे, नदियां वापस नहीं आ सकतीं। मात्र एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) बना देने से या फिर सीवरेज को नदियों में गिरने से रोक देने से नदियां साफ नहीं हो...

समावेश की खेती

Monday, August 3, 2015
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जैविक खेती में विकलांगों का योगदान हैरानी उत्पन्न करता है

हमारे देश में विकलांग व्यक्तियों को ज्यादातर निरुपयोगी और आश्रित समझा जाता है। गाँव में यह हालात और भी बदतर हो जाते हैं जहां पर बुनियादी सुविधाओं की कमी और सहायक उपकरणों का आभाव विकलांगों को अपनी क्षमता पहचाने से रोकते हैं। ऐसी स्थिति में जैविक खेती में विकलांगों का योगदान हैरानी ही उत्पन्न करेगा। लेकिन बैतूल, मध्य प्रदेश, में  एक नई धारणा स्थापित हो रही हैं

अकाल अच्छे कामों का भी

Tuesday, April 26, 2016
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तालाब ऊपर से सूख जाने के बाद रेत में समा गई नमी को हमारे पुरखे न जाने कब से बेरी, कुंई नाम का एक सुंदर ढांचा बना कर उपयोग में ले आते हैं

आपके यहां कितना पानी गिरता है, आप ही जानें। हमारे यहां पिछले दो साल में कुल हुई बरसात की जानकारी हम आप तक पहुंचाना चाहते हैं। सन् 2014 में जुलाई में 4 एम.एम. और फिर अगस्त में 7 एम.एम. यानी कुल 11 एम.एम. पानी गिरा था। तब भी हमारा यह रामगढ़ क्षेत्र अकाल की खबरों में नहीं आया। हमने खबरों में आने की नौबत ही नहीं आने दी। फिर पिछले साल सन् 2015 में 23 जुलाई को 35 एम.एम., 11 अगस्त को 7 एम.एम. और फिर 21 सितंबर को 6 एम.एम. बरसात हुई। इतनी कम बरसात में...

बेघर विक्षिप्तों को समाज से जोड़ रहा ‘हाई’ क्लीनिक

बेघर लोगों में गंभीर मानसिक रोग ज्यादा अनुपात में मिलता है, बजाय उनके जो सुरक्षित रूप से बसे हैं। चित्र:  टोमस कास्तेल्जो

दिल्ली में एक मोबाइल क्लिनिक विशेष रूप से मानसिक रूप से बीमार लोगों को समाज से जोड़ने का कम कर रहा हैं। यह लोग हमारे समाज के सबसे कमजोर तबके से होने के कारण हमेशा कतार के आखिर में खड़े रह जाते हैं । कोई स्थाई घर न होने के चलते यह संवैधानिक अधिकार और निवारण तंत्र के तहत मिलने वाले उन लाभों से भी वंचित रह जाते हैं जिनसे वे अपनी जिदंगी बेहतर बना सकें। इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि बेघर लोगों में गंभीर मानसिक रोग ज्यादा अनुपात में मिलता है,...